कवित्त
{1}
इंद्र जिमि जंभ पर बाड़व ज्यौं अंभ पर । ।रावन सदंभ पर रघुकुल राज है ।
पौन बारिबाह पर संभु रतिनाह पर । ।ज्यौं सहस्रबाहु पर राम द्विजराज है ।
दावा द्रुम - दंड पर चीता मृग - झुंड पर । ।भूषन बितुंड पर जैसे मृगराज है ।
तेज तम अंस पर कान्ह जिमि कंस पर । ।यौं मलेच्छ बंस पर सेर सिवराज है ।
भवार्थ -जैसे इंद्र (स्वर्ग के राजा) ने जंबासुर(ब्रह्म जी के द्वारा वरदान प्राप्त राक्षस) को नष्ट कर दिया, बरवनाल की आग समुद्र को भिगो देती है, रघुकुलराज (राम राज) राम ने अहंकारी रावण पर विजय प्राप्त की जैसे ही हवा बादलों को घोलती है, शिव कामदेव (भगवान ब्रह्मा के पुत्र) को भस्म कर देते हैं। जैसे द्विजराज परशुराम (भगवान विष्णु के छठे अवतार) ने सहसाबाहू (मुगलों के साथ वीर शिवाजी अतिप्रवाह) को हरा दिया।
{२}
निकसत म्यान ते मयूखै । । प्रलै - भानु कैसी , फारै तम - तोम से गयंदन के जाल को ।
लागति लपकि कंठ बैरिन के नागिनि सी । । रुद्रहि रिझावै दै दै मुंडन की माल को ।
लाल छितिपाल छत्रसाल महाबाहुबली । ।कहाँ लौं बखान करौं तेरी करवाल को प्रतिभट कटक कटीले केते काटि काटि । ।कालिका सी
किलकि कलेऊ देति काल को । ।
भवार्थ -दावानल जैसे विशाल पेड को राख़ कर है, चीता हिरणों के झुण्ड को तहस नहस कर देता है
भूषण कहते हैं जैसे शेर हाथी को पछाड़ देता है
उजाला अँधेरे को समाप्त कर देता है, भगवन श्री कृष्ण कंस का संहार करते हैं
वैसे ही मुगलों के वंश पर अपना शेर वीर शिवाजी जी भारी पड़ता है ।।
कवी -भूषण
कवि भूषण (1813-1412) बुंदेली राजा छत्रसाल और मराठा राजा शिवाजी के दरबार में एक भारतीय कवि थे। उन्होंने मुख्य रूप से ब्रजभाषा में संस्कृत, अरबी और फारसी भाषाओं के शब्दों के साथ लिखा। वे अनुप्रस और श्लेशा अलंकार के विद्वान कवि थे।भूषण हिंदी कविता में रीतिकाल के एक प्रसिद्ध कवि हैं जिनका हिंदी जनता में बहुत सम्मान है । वे जातीय स्वाभिमान , आत्मगौरव , शौर्य एवं पराक्रम के कवि हैं । वीर रस के इस महान कवि ने फड़कती हुई मुक्तक शैली में छत्रपति शिवाजी और बुंदेला वीर राजा छत्रसाल की वास्तविकता पर आधारित विरुदावलियाँ गाई हैं । ओज , पराक्रम और उत्साह से भरे हुए कवि भूषण के प्रवाहमय छंद हिंदी जनता के बीच शताब्दियों से चाव के साथ गाए जाते रहे हैं । उनकी लोकप्रियता का यह प्रमाण है कि जनमानस में भूषण वीर रस के पर्याय और प्रतिमूर्ति को तरह प्रतिष्ठित हैं । मध्यकाल में भाव - भाषा और अभिव्यक्ति के विविध क्षेत्रों और रूपों पर धर्म का रंग गहरा था । जातीय चेतना और भावना से धर्मभावना को विलग कर सकना सहज नहीं था । स्वभावतः भूषण की जातीय भावना भी इसका अपवाद नहीं थी । स्वयं सत्ताधारी शासक वर्ग अपने राजनीतिक चातुर्य , सूझ - बूझ एवं उदारता के बावजूद धार्मिक - जातीय भेद - बुद्धि से अनुप्राणित और चालित था । स्वभावतः मध्यकालीन काव्य को ऐतिहासिक तथ्यों के प्रकाश में ही देखना - परखना होगा और आज की धर्म - संप्रदाय - निरपेक्ष जनतांत्रिक दृष्टि से उसकी मूल्यवत्ता की पड़ताल और पहचान करनी होगी । महाराणा प्रताप , छत्रपति शिवाजी या छत्रसाल जैसे इतिहास प्रसिद्ध व्यक्ति अपने कार्यों से अपने युगों में ही लोकनायक बन चुके थे । जननायक की उनकी ऐतिहासिक छवि आज भी जनमानस में अक्षुण्ण रूप से प्रतिष्ठित है ।
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